नई दिल्ली : अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता हथियाने पर अमेरिका को वहां से भागना पड़ा था. वहीं अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान से मांग की है कि वह बगराम एयरबेस का कंट्रोल वाशिंगटन को वापस कर दे. उन्होंने वहां कि तालिबान सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अफगानिस्तान ने ऐसा नहीं किया तो बुरी चीजें हो सकती हैं. इसको लेकर ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट भी शेयर किया.
ट्रंप की चेतावनी : ट्रंप ने अपनी पोस्ट में चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अफगानिस्तान बगराम एयरबेस को उसे बनाने वालों यानी अमेरिका को वापस नहीं करता है तो बुरी चीजें घट सकती हैं. बता दें कि साल 2021 में अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से हटने के बाद बगराम एयरबेस अभी तक तालिबान के कंट्रोल में है.
ट्रंप ने बार-बार संकेत दिया है कि अफगानिस्तान-चीन बॉर्डर के पास स्थित इस एयरबेस के महत्व को देखते हुए वह इस पर अपना कंट्रोल बनाए रखेंगे. ट्रंप ने बीते दिनों अपनी लंदन यात्रा में कहा था कि अमेरिका एयरबेस पर वापस कंट्रोल पाने की कोशिश कर रहा है.
‘हमने उन्हें यह मुफ्त में दे दिया…’ : ट्रंप ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के सामने कहा, ‘हम अफगानिस्तान छोड़ने जा रहे थे, लेकिन हम इसे पूरी ताकत और सम्मान के साथ छोड़ने जा रहे थे और हम बगराम, बड़े हवाई अड्डे को अपने पास रखने जा रहे थे, जो दुनिया के सबसे बड़े हवाई अड्डों में से एक है.’ उन्होंने आगे कहा,’हमने उन्हें यह मुफ्त में दे दिया. वैसे हम इसे वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं.’ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप के इस फैसले का अमेरिकी कांग्रेस के कई सदस्यों ने समर्थन किया है.
चीन का रिएक्शन : चीन ने अमेरिका की इस टिप्पणी को खारिज किया है. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा,’ चीन अफगानिस्तान की स्वतंत्रता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करता है. अफगानिस्तान का भविष्य उसके लोगों के हाथों में होना चाहिए. हम सभी पक्षों से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता में रचनात्मक भूमिका निभाने का आह्वान करते हैं.’ उन्होंने आगे कहा कि क्षेत्र में टकराव को बढ़ावा देने के पीछे जनता का समर्थन नहीं है. वहीं अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी ने कहा,’ अफगानिस्तान की एक इंच जमीन भी विदेशी सैन्य उपस्थिति के लिए स्वीकार्य नहीं है. यह संदेश राष्ट्रपति ट्रंप और अन्य देशों तक पहुंचना चाहिए. बातचीत केवल राजनीतिक और आर्थिक होगी.’
