नई दिल्ली : बांग्लादेश में भड़की हिंसा के बीच भारतीय कलाकारों के लिए हालात कितने खतरनाक हो गए थे, इसकी सिहरन भरी तस्वीर कोलकाता लौटे एक युवा तबला वादक की जुबानी सामने आई है। ढाका में कार्यक्रम के दौरान फंसे कलाकारों को अपनी पहचान छुपानी पड़ी, नाम बदलना पड़ा और चुप्पी साधनी पड़ी, तब जाकर वे सुरक्षित अपने देश लौट सके। यह कहानी सिर्फ एक कलाकार की नहीं, बल्कि उस डर की है जो हिंसा के बीच आम इंसानों को जीने पर मजबूर कर देता है।
तबला वादो-क मैनाक बिस्वास ने बताया कि ढाका में हालात अचानक बिगड़ गए। जिन सरोद कलाकार के साथ वे गए थे, वे तो किसी तरह निकल आए, लेकिन बाकी टीम हिंसा के बीच फंस गई। प्रदर्शन, तोड़फोड़ और भारत-विरोधी माहौल के कारण उन्हें 48 घंटे तक होटल में छिपकर रहना पड़ा। बाहर निकलना पड़ा तो उन्होंने अपनी भारतीय पहचान छुपाई और स्थानीय नाम अपनाया।
कार्यक्रम रद्द और भीड़ का हमला : ढाका के धनमंडी इलाके में स्थित सांस्कृतिक केंद्र में होने वाला संगीत कार्यक्रम हिंसक भीड़ के हमले के बाद रद्द कर दिया गया। सरोद वादक शिराज़ अली खान किसी तरह कोलकाता लौट आए, लेकिन उनकी मां और बाकी टीम, जिसमें मैनाक बिस्वास भी थे, वहीं फंस गए। संगीत वाद्ययंत्रों को तोड़ा गया और परिसर में भारी तोड़फोड़ हुई।
पहचान छुपाकर बची जान : मैनाक बिस्वास ने बताया कि बाहर निकलते समय उन्होंने अपना भारतीय परिचय जाहिर नहीं होने दिया। टैक्सी बुक करते वक्त उन्होंने अपना नाम बदला और होटल स्टाफ की मदद ली। वे कहते हैं कि ढाका की सड़कों पर भारत-विरोधी भावना साफ महसूस हो रही थी। अगर बोली से पहचान खुल जाती तो स्थिति और खतरनाक हो सकती थी। चुप रहना ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा बन गया।
क्यों भड़की थी हिस्सा? : यह हिंसा इंकलाब मंच के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद भड़की। जुलाई 2024 में हुए आंदोलन से जुड़े इस नेता की मौत के बाद पूरे देश में उबाल फैल गया। इसी दौरान मीडिया संस्थानों और सांस्कृतिक केंद्रों पर भी हमले हुए। बांग्लादेश की राजनीति में अस्थिरता और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के दौर से जुड़े विवादों ने माहौल को और संवेदनशील बना दिया।
एयरपोर्ट पहुंचकर मिली राहत : टीम के बाकी सदस्य कई घंटे डर के साए में एयरपोर्ट लाउंज में बैठे रहे। सड़कों पर प्रदर्शन और अचानक भीड़ जुटने की खबरों के बीच हर कदम सोच-समझकर उठाना पड़ा। मैनाक को अपने तबले की भी चिंता थी, क्योंकि उन्होंने वाद्ययंत्रों को तोड़े जाने की तस्वीरें देखी थीं। कोलकाता एयरपोर्ट पर तबला सुरक्षित मिला, तब जाकर उन्हें सुकून मिला।
कोलकाता लौटकर मैनाक बिस्वास ने कहा कि वे जल्द ही एक कार्यक्रम में प्रस्तुति देंगे, लेकिन बांग्लादेश की यादें लंबे समय तक पीछा करेंगी। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति साझा होने के बावजूद डर का यह अनुभव उन्हें अंदर तक झकझोर गया है। हालात सामान्य होने तक वे दोबारा वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे।
