दिल्ली : JNU में प्रदर्शन के दौरान विवादित नारेबाजी पर एक्शन तेज, वीडियो फुटेज की बारीकी से जांच शुरू 

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नई दिल्ली : राजधानी दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) प्रशासन ने 6 जनवरी 2026 को साबरमती परिसर में हुए एक हालिया प्रदर्शन से संबंधित वीडियो पर कड़ा रुख अपनाया है। प्रशासन का कहना है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे इन वीडियो में विश्वविद्यालय के अनुशासन और नियमों का खुला उल्लंघन दिखाई दे रहा है। विश्वविद्यालय की प्रॉक्टोरियल टीम वर्तमान में इन फुटेज की बारीकी से जांच कर रही है ताकि घटना में शामिल व्यक्तियों की पहचान की जा सके। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि परिसर की शांति भंग करने और शैक्षणिक माहौल को प्रभावित करने वाली किसी भी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

जेएनयू में पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ लगाए गए नारों पर भाजपा नेता गौरव वल्लभ ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के बारे में सवाल उठाना देश के चुने हुए पीएम और गृह मंत्री के लिए अपशब्द बोलना और उनके लिए कब्र खोदने जैसी बाते करने से बड़ा राष्ट्रद्रोह और देशद्रोह नहीं कोई कर सकता है और दुख की बात ये है कि ये जो देशद्रोह कर रहे हैं उसका पैसा इस देश के 140 करोड़ लोग देते हैं.मुझे लगता है कि इनकी जितनी निंदा की जाए वो कम है

वहीं उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने JNU कैंपस में नारेबाज़ी पर कहा, “वहां लोग शिक्षा हासिल करने जाते हैं। राजनीति करनी है तो छात्र राजनीति करिए। देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से आपको क्या मतलब है? देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की बात करते हैं तो इसका मतलब है किसी राजनीतिक दल से प्रेरित होकर आप ये भाषा बोल रहे हैं। ये भाषा नहीं बोलने दी जाएगी। ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई होगी।”

वहीं कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने JNU में PM नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारे लगाए जाने पर कहा, “कई बार होता है कि कोर्ट के जजमेंट के खिलाफ कुछ लोग या समूह खड़े होते हैं आप उसके खिलाफ विरोध भी कर सकते हैं लेकिन किसी चीज के आड़ में ऐसे अपशब्द उपयोग करना ये सिर्फ पीएम मोदी और गृह मंत्री की बात नहीं है लेकिन किसी सामान्य व्यक्ति के लिए भी कब्र जैसे शब्दों का इस्तेमाल करें तो ये बिल्कुल गलत है। हम इसकी निंदा करते हैं। आप अपनी बात कहिए कठोर शब्दों में कहिए इसमें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन लोकतांत्रिक परंपराओं में और देश की सभ्यता को देखते हुए ये कांग्रेस का हमेशा मत रहा है कि राजनीति में हमेशा शब्दों का एक  सभ्यता से एक सीमा के अंदर उपयोग होना चाहिए…इस तरह की भाषा का हमारे समाज और राजनीति में कोई जगह नहीं है।”

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