नई दिल्ली : एक नई वैज्ञानिक स्टडी में खुलासा हुआ है कि अरबों वर्षों से पृथ्वी के वायुमंडल के सूक्ष्म कण जैसे पानी के अणु और नाइट्रोजन पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की मदद से धीरे-धीरे चंद्रमा की सतह तक पहुंचते रहे हैं. इसका मतलब यह है कि चंद्रमा की मिट्टी में पृथ्वी के वायुमंडल और जलवायु का एक बेहद प्राचीन रिकॉर्ड सुरक्षित हो सकता है, जो आने वाले समय में अंतरिक्ष यात्रियों और वैज्ञानिकों के लिए काफी अहम साबित हो सकता है. रिसर्चर्स ने इन दावों को लेकर नासा के अपोलो मिशनों के दौरान चंद्रमा से लाए गए मिट्टी और चट्टानों के नमूनों का गहन विश्लेषण भी किया.
रिसर्चर्स के इस विश्लेषण में पाया गया कि इन नमूनों में मौजूद नाइट्रोजन और अन्य तत्वों की मात्रा इतनी अधिक है कि उन्हें केवल सौर हवा से नहीं समझाया जा सकता. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अतिरिक्त मात्रा इस बात का संकेत देती है कि ये तत्व पृथ्वी के वायुमंडल से निकलकर चंद्रमा तक पहुंचे हैं. स्टडी के मुताबिक, जब पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र सौर हवा से टकराता है तो वह एक तरह की सुरंग या मैग्नेटिक टेल बनाता है. इसके जरिए वायुमंडलीय कण अंतरिक्ष में फैलते हुए चंद्रमा की सतह पर जमा हो जाते हैं.
चंद्रमा के अध्ययन में होगी आसानी : बीते कई अरब वर्षों से समय के साथ-साथ ये कण चंद्र मिट्टी में कैद हो गए और अब वे पृथ्वी के पुराने वातावरण और जलवायु परिस्थितियों की जानकारी देने वाला एक प्राकृतिक संग्रह बन चुके हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में चंद्रमा पर होने वाले मिशन इन सैंपल्स का अध्ययन कर पृथ्वी के वायुमंडल के विकास, जलवायु परिवर्तन और यहां तक कि जीवन के शुरुआती दौर को समझने में मदद कर सकते हैं.
वैज्ञानिकों ने किए चौंकाने वाले खुलासे : नेचर कम्युनिकेशंस: अर्थ एंड एनवायरनमेंट में प्रकाशित एक नई स्टडी में वैज्ञानिकों ने पृथ्वी और चंद्रमा के बीच होने वाले एक अहम प्राकृतिक ट्रांसफर को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है. रोचेस्टर यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स के मुताबिक, पृथ्वी का वातावरण इस प्रक्रिया को रोकने के बजाय उसे बढ़ावा देने में भूमिका निभा रहा है. स्टडी के अनुसार, सोलर विंड यानी सूर्य से निकलने वाली ऊर्जावान कणों की धारा जब पृथ्वी के वायुमंडल और मैग्नेटिक फील्ड से टकराती है, तो उसका असर चंद्रमा की सतह पर भी पड़ता है. वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की मिट्टी (लूनर सॉइल) में मौजूद कणों के डेटा को उन्नत कंप्यूटेशनल मॉडलिंग के साथ जोड़ा, ताकि यह समझा जा सके कि सोलर विंड पृथ्वी के एटमॉस्फियर के साथ किस तरह इंटरैक्ट करती है.
अरबों साल पहले पृथ्वी का वातावरण आज से अलग : रिसर्चर्स का कहना है कि इस प्रक्रिया के अध्ययन से न केवल चंद्रमा की सतह पर मौजूद कणों की उत्पत्ति और संरचना को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है, बल्कि पृथ्वी के वायुमंडल और उसके मैग्नेटिक फील्ड के इतिहास का भी पता लगाया जा सकता है. स्टडी में यह संकेत मिला है कि अरबों साल पहले पृथ्वी का मैग्नेटिक फील्ड और वातावरण आज से अलग था और उसका प्रभाव चंद्रमा तक पहुंच रहा था. वैज्ञानिकों के अनुसार, चंद्रमा की मिट्टी एक तरह का ‘नेचुरल रिकॉर्ड’ है. जिसमें पृथ्वी और सूर्य के बीच हुए पुराने इंटरैक्शन के निशान सुरक्षित हैं. इस रिसर्च से भविष्य में यह समझने में मदद मिल सकती है कि पृथ्वी का वायुमंडल कैसे विकसित हुआ और उसने जीवन को सुरक्षित रखने में कैसी भूमिका निभाई.
चांद की ऊपरी सतह पर क्या-क्या? : 1970 के दशक में अपोलो मिशनों के दौरान चांद से इकट्ठा की गई चट्टानों और मिट्टी के सैंपल्स का विश्लेषण करने पर वैज्ञानिकों को चांद की सतह की ऊपरी परत में पानी, कार्बन डाइऑक्साइड, हीलियम, आर्गन और नाइट्रोजन जैसे तत्व और गैसें मिली थीं. शुरू में माना गया कि इनमें से कई कण सोलर विंड यानी सूर्य से आने वाली कण-धारा के जरिए चांद तक पहुंचे होंगे. हालांकि, सैंपल्स में नाइट्रोजन की मात्रा ने वैज्ञानिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया. रिसर्चर्स का मानना है कि इतनी अधिक नाइट्रोजन सिर्फ सोलर विंड से आना संभव नहीं है. इससे पहले की एक स्टडी में यह दावा किया गया था कि ये कण उस दौर में चांद की सतह पर जमा हुए होंगे, जब पृथ्वी की मैग्नेटिक फील्ड पूरी तरह विकसित नहीं हुई थी.
