पाकिस्तान : विभाजन के कट्टर समर्थक ‘सेक्युलर’ हिंदू को काट डाला, जिहादियों ने लाहौर में पहले उसे ही मारा

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नई दिल्ली : भारत और पाकिस्तान का विभाजन ऐसी कड़वी हकीकत है, जिसे याद कर हर कोई सिहर जाता है. अपनी मुस्लिम देश की मांग को पूरा करने के लिए जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम लीग ने कत्लेआम का ऐसा दौर चलाया कि इंसानियत भी शरमा उठी. कांग्रेस को न झुकते देख जब जिन्ना ने 1946 में ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का आह्वान किया तो बंगाल समेत पूरे देश में हिंदुओं को चुन-चुनकर क्रूरता के साथ मारा गया.

मुस्लिम लीग के इन कारनामों के बावजूद कई ‘सेक्युलर’ हिंदू ऐसे भी थे, जो जिन्ना की मांग के कट्टर समर्थक थे. उनका मानना था कि मुसलमानों को भी अपना अलग पाने का हक है. उनके लिए भी अलग देश बनना चाहिए. लाहौर में बसे ऐसे ही एक ‘सेक्युलर’ हिंदू ने जिन्ना पर भरोसा कर भारत आने से इनकार कर दिया. उसका मानना था कि जिन्ना के राज में पाकिस्तान में मुसलमानों के साथ गैर-मुस्लिमों को भी बराबर के अधिकार मिलेंगे. लेकिन जैसे ही ब्रिटिश सरकार ने अलग पाकिस्तान के गठन की घोषणा की गई तो जिहादियों की भीड़ ने सबसे पहले उसी ‘सेक्युलर’ हिंदू को मारा, जो पाकिस्तान की मांग का सबसे बड़ा समर्थक था.

हम बात कर रहे हैं प्रोफेसर बृज नारायण की, जिन्हें बृज नरैन के नाम से भी जाना जाता था. वे लाहौर में रहने वाले एक प्रमुख हिंदू अर्थशास्त्री थे. उन्हें मोहम्मद अली जिन्ना का कट्टर समर्थक थे और पाकिस्तान की मांग का खुला पक्षधर माना जाता था. उन्हें अपने सेक्युलर होने पर बहुत गर्व था. बृज नारायण का कहना था कि देश के मुसलमानों को भी अपना मुल्क पाने का पूरा हक है. इस मांग पर जोर देने के लिए उन्होंने कई पुस्तकें और लेख लिखे. उन सभी लेखों में उन्होंने पाकिस्तान के गठन के पक्ष में तमाम दलीलें देकर मुस्लिमों के लिए अलग मुल्क की मांग दोहराई.

वे मानते थे कि एक अलग पाकिस्तान ही सही मायने में मुसलमानों के हितों की रक्षा कर सकेगा. इसके साथ ही उन्हें जिन्ना के इस वादे पर यकीन था कि पाकिस्तान में गैर-मुसलमानों के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा. जब भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग पाकिस्तान की मांग को लेकर हिंदुओं पर सुनियोजित हमले किए गए तो प्रोफ़ेसर बृज नारायण ने इसे स्वभाविक प्रतिक्रिया बताकर टाल दिया. बृज नारायण ने कहा कि जब बड़ा आंदोलन चलता है तो इस तरह की घटनाएं हो जाती हैं. उनके इस काम से जिन्ना बहुत खुश थे और कहा कि अलग पाकिस्तान बनने पर उन्हें वहीं रहने की गुजारिश की.

विभाजन की घोषणा के बावजूद नहीं छोड़ा लाहौर : जब लोगों को लगने लगा कि अब भारत का विभाजन होकर ही रहेगा तो मई 1947 से लाहौर समेत आसपास के शहरों में रहने वाले हिंदुओं का दिल्ली, अमृतसर की ओर पलायन शुरू हो गया. अगस्त 1947 आते-आते लाहौर में केवल 10 हजार हिंदू ही बचे थे. इतिहासकार सोम आनंद के अनुसार, बचे हिंदू यह उम्मीद पाले थे कि स्थिति सामान्य हो जाएगी और वे पाकिस्तान में अपनी मूल भूमि पर रह पाएंगे. हालांकि उनकी उम्मीद जल्द ही मिट्टी में मिल गई.

जैसे ही ब्रिटिश सरकार ने पाकिस्तान के गठन की घोषणा की, लाहौर में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी. आपराधिक गिरोहों ने शहर में  लूटपाट और हत्याओं का सिलसिला शुरू कर दिया. ढूंढ-ढूंढकर हिंदुओं और सिखों के घरों को लूटकर जलाया गया. जो भी हिंदू-सिख दिखे, उन्हें बेदर्दी के साथ मार दिया गया. अपने सामने हिंसा का खुला नाच होते देखने के बावजूद प्रोफ़ेसर बृज नारायण अपने सिद्धांतों पर अडिग थे. उन्होंने लाहौर को अपनी मातृभूमि घोषित किया और कहा कि वे इसे नहीं छोड़ेंगे.

पाकिस्तान की मांग के थे कट्टर समर्थक : रिसर्चर इश्तियाक अहमद अपनी पुस्तक में कहते हैं कि लाहौर में दंगों की आग फैल रही थी. इसी दौरान एक उन्मादी भीड़ बृज नारायण के इलाके में पहुंची. यह भीड़ खाली पड़े हिंदू-सिखों के घरों को लूटकर आग के हवाले कर रही थी. ‘अल्लाह ओ अकबर’ के नारे लगा ही हिंसक भीड़ को देखकर भी बृज नारायण को डर नहीं लगा. उन्हें इस बात का गर्व था कि अलग पाकिस्तान की मांग को आवाज देने में उनका भी अहम योगदान रहा है. इसलिए वहां के मुसलमान उनका सम्मान जरूर करेंगे.

बेखौफ होकर बृज नारायण भीड़ के पास पहुंचे और कहा कि यह संपत्ति अब पाकिस्तान की है, इसे नष्ट न करें. उनकी बातों का असर हुआ और लोग वहां से तितर-बितर हो गए. हालांकि यह शांति क्षणभंगुर थी. कुछ ही देर बाद, एक और हिंसक समूह वहां पहुंचा. नारायण ने फिर से उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन इस बार उनकी आवाज दब गई. भीड़ में से कोई चिल्लाया, ‘यह काफ़िर है, इसे मार डालो!’

जिहादियों ने ‘सेक्युलर’ हिंदू को मार डाला : उसके इतना कहते ही सैकड़ों जिहादियों की कट्टर भीड़ नारायण पर टूट पड़ी और तलवारों से काटकर उनकी हत्या कर दी गई. हत्या के बाद उनके घर को लूटकर आग के हवाले कर दिया गया. साथ ही उनकी मेहनत से बनाई लाइब्रेरी को भी खाक में बदल दिया गया. इसके साथ ही जिन्ना और पाकिस्तान का वह कट्टर समर्थक बुरी दुर्गति के साथ हमेशा के लिए इस दुनिया से चला गया. एक ऐसे नापाक मुल्क के लिए, जिसने उसकी वफा का सिला उसकी निर्दयता से हत्या के साथ दिया. (साभार : Z News) 

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