नई दिल्ली : इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल आथर्टन ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) पर बड़ा आरोप लगाया है। उनका कहना है कि आईसीसी अपने टूर्नामेंटों में भारत और पाकिस्तान के बीच मैच सुनिश्चित करने के लिए ड्रॉ को सुव्यवस्थित तरीके से तय करती है, ताकि आर्थिक लाभ अधिक से अधिक हो सके।
‘द टाइम्स’ में लिखे अपने एक कॉलम में आथर्टन ने कहा कि यह सब आर्थिक जरूरतों और व्यावसायिक हितों के तहत किया जा रहा है। उन्होंने यहां तक कहा कि अब समय आ गया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट को पूरी तरह से बंद कर दिया जाए, क्योंकि यह खेल अब तनाव और दुष्प्रचार का माध्यम बन चुका है।
आथर्टन ने अपने लेख में हाल ही में हुए एशिया कप विवाद का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि टूर्नामेंट के दौरान भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया था, और जब भारत ने खिताब जीता, तो एसीसी प्रमुख और पाकिस्तान के मंत्री मोहसिन नकवी ट्रॉफी लेकर चले गए क्योंकि भारतीय टीम ने उनसे ट्रॉफी लेने से मना कर दिया था। उन्होंने इस घटना को उदाहरण बनाते हुए कहा कि क्रिकेट अब कूटनीति नहीं, बल्कि विवाद और विभाजन का जरिया बन गया है।
आथर्टन ने खुलासा किया कि भारत और पाकिस्तान 2013 से लेकर अब तक हर आईसीसी टूर्नामेंट के ग्रुप चरण में एक-दूसरे से भिड़ते रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘इससे फर्क नहीं पड़ता कि फॉर्मेट राउंड-रोबिन रहा या ग्रुप स्टेज वाला — हर बार ड्रॉ ऐसे बनाए गए कि भारत-पाकिस्तान का मैच जरूर हो।’ उन्होंने यह भी जोड़ा कि तीन 50 ओवर विश्व कप, पांच टी20 विश्व कप और तीन चैंपियंस ट्रॉफी में दोनों टीमें आमने-सामने आई हैं, जो यह दिखाता है कि यह सब महज संयोग नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित व्यवस्था है।
आथर्टन ने अपने लेख में यह भी कहा कि भारत-पाकिस्तान मैचों के कारण आईसीसी टूर्नामेंटों के प्रसारण अधिकारों की कीमत आसमान छू रही है। उन्होंने लिखा, ‘कम द्विपक्षीय मुकाबलों की वजह से यह मैच आर्थिक रूप से बेहद अहम हो गया है। यही कारण है कि 2023-27 चक्र के प्रसारण अधिकार लगभग तीन अरब डॉलर में बेचे गए।’ उन्होंने कहा कि जब द्विपक्षीय सीरीज का आकर्षण घटता है, तो आईसीसी टूर्नामेंटों की अहमियत बढ़ जाती है, और इसमें भारत-पाकिस्तान मैच विज्ञापनदाताओं और दर्शकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बन जाते हैं।
आथर्टन ने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि आईसीसी टूर्नामेंटों में भारत और पाकिस्तान के बीच कम से कम एक मैच तय करने की रणनीति खत्म की जाए। उन्होंने एशिया कप के उदाहरण में बताया कि उस टूर्नामेंट का ड्रॉ और शेड्यूल इस तरह बनाया गया था कि दोनों टीमें हर रविवार को भिड़ें, जिससे दर्शकों की संख्या और विज्ञापन राजस्व दोनों बढ़े।
उन्होंने कहा, ‘किसी गंभीर खेल के लिए यह शर्म की बात है कि टूर्नामेंट की संरचना आर्थिक जरूरतों के हिसाब से तय की जाए। क्रिकेट को अगर कूटनीति का साधन कहा गया था, तो अब यह तनाव और प्रचार का हथियार बन गया है।’
तनाव के दौर में क्रिकेट का अर्थहीन होना : पहलगाम में हाल ही में हुए आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के बीच तनाव फिर से चरम पर पहुंच गया है। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों द्वारा 26 भारतीयों की हत्या के बाद भारत ने सैन्य कार्रवाई की थी। आथर्टन का कहना है कि ऐसे माहौल में क्रिकेट मुकाबले केवल उस तनाव का व्यावसायिक दोहन बनकर रह गए हैं। उन्होंने लिखा, ‘आईसीसी जानबूझकर दोनों देशों को एक ग्रुप में रखती है ताकि तनाव, दर्शक संख्या और राजस्व बढ़ाया जा सके।’
द्विपक्षीय क्रिकेट पर प्रतिबंध, फिर भी जारी है ड्रामा : 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच कोई द्विपक्षीय क्रिकेट सीरीज नहीं हुई है। भारत सरकार ने हाल ही में यह नीति बनाई है कि दोनों देशों के बीच तटस्थ स्थानों पर भी सीरीज नहीं खेली जाएगी, हालांकि ओलंपिक चार्टर के तहत बहुपक्षीय टूर्नामेंटों को छूट दी गई है। आथर्टन ने कहा कि अब क्रिकेट को राजनीति और व्यवसाय का औजार बना दिया गया है। उन्होंने लिखा, ‘एक समय था जब क्रिकेट दोनों देशों के बीच संवाद का जरिया था, लेकिन अब यह सन्नाटे में बदल गया है।’
‘ड्रॉ हो पारदर्शी, मैच हों स्वाभाविक’ : आथर्टन ने आईसीसी से मांग की है कि अगले प्रसारण अधिकार चक्र के लिए मैचों का ड्रॉ पूरी तरह पारदर्शी तरीके से किया जाए। उन्होंने कहा, ‘अगर हर टूर्नामेंट में भारत और पाकिस्तान नहीं भिड़ते, तो कोई बात नहीं। क्रिकेट को खेल बने रहने दीजिए, कारोबार नहीं।’
