नई दिल्ली/काबुल : अफगानिस्तान में बीते दिनों आए भूंकप ने हजारों लोगों के जीवन को तबाह कर दिया। इस आपदा के चलते देशभर में मातम का माहौल है। दूसरी तरफ गौर करने वाली बात ये है कि इस तबाही में सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना महिलाओं को करना पड़ा। मीडिया रिपोर्ट की माने तो तालिबान की सख्त सांस्कृतिक और धार्मिक पाबंदियों के कारण महिलाओं तक राहत पहुंचाना लगभग नामुमकिन हो गया है। भूकंप के 36 घंटे बाद भी एक भी महिला को मदद नहीं मिली।
तालिबान की ‘दूसरे पुरुषों से सपंर्क न करने की’ सख्त हिदायत के कारण पुरुष बचावकर्मी महिलाओं की मदद तक नहीं कर पा रहे हैं, चाहे उनकी जान खतरे में हो। इससे कई घायल महिलाएं मलबे के नीचे फंसी रह गईं और उन्हें समय पर इलाज नहीं मिल सका। फलस्वरूप कुछ ने अपना दम तोड़ दिया तो कुछ संघर्ष करती रहीं।
19 साल की आयशा ने बताता कैसा था भयावह मंजर : इस आपदा में संघर्ष कर रहीं महिलाओं में कुनार प्रांत के अंदरलुकक गांव की रहने वाली 19 वर्षीय आयशा ने भूकंप के बाद चीख पूकार करते उस भयावह मंजर को याद किया। आयशा ने बताया कि कैसे इस भयावह आपदा के समय महिलाओं को नजरअंदाज किया गया। उन्होंने बताया कि हम महिलाओं को एक कोने में इकट्ठा कर दिया गया और भुला दिया गया। मदद के लिए कोई नहीं आया, किसी ने पूछा तक नहीं कि हमें क्या चाहिए।
इतना ही नहीं तालिबान के सख्त शासक ने महिलाओं को चिकित्सा शिक्षा और सार्वजनिक कामों में हिस्सा लेने से भी रोक रखा है। इसलिए महिला डॉक्टरों और बचावकर्मियों की भारी कमी रही, खासकर ग्रामीण इलाकों में। यह महिलाओं के लिए और भी बड़ी मुसीबत बन गया है।
पुरुष स्वयंसेवक ताजिबुल्लाह ने क्या कहा? : वहीं इसके बारे में एक पुरुष स्वयंसेवक 33 साल के ताजिबुल्लाह मुहाजेब ने बताया कि मलबे के नीचे फंसी महिलाओं को निकालने में उनके मेडिकल टीम के पुरुष सदस्य हिचकिचाते थे। उन्होंने कहा कि महिलाएं जैसे अदृश्य थीं। मुहाजेब ने बताया कि इस दौरान पुरुषों और बच्चों का इलाज पहले होता था, जबकि महिलाएं दूर बैठकर मदद के इंतजार में थीं।
धार्मिक पाबंदिया महिलाओं के लिए बनी जी का जंजाल : इन धार्मिक पाबंदियों के चलते अगर किसी महिला के साथ कोई पुरुष रिश्तेदार मौजूद नहीं था, तो बचावकर्मी बिना छुए उनके कपड़ों से शव को बाहर निकालते थे। यह सख्त नियम महिलाओं की मदद में भारी बाधा बन रहा है। संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन की विशेष प्रतिनिधि सुसान फर्ग्यूसन ने कहा कि महिलाओं और लड़कियों को फिर से इस आपदा का सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। उनकी जरूरतों को राहत और पुनर्निर्माण के केंद्र में रखना होगा।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने भी जताई चिंता : अफगानिस्तान में महिलाओं की इस त्रासदी को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन भी चिंतित हैं और तालिबान की नीतियों को कड़ा आलोचना का निशाना बना रहे हैं। वे कह रहे हैं कि राहत कार्यों में महिलाओं को समान और सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करनी चाहिए। गौरतलब है कि अफगानिस्तान में बीते दिनों आए बड़े भूकंप में अब तक 2200 से ज्यादा लोग मारे गए और 3600 से ज्यादा घायल हुए हैं। राहत कार्यों में महिलाओं को प्राथमिकता नहीं मिलने से उनके हालात और खराब हो गए हैं।
