ईद-ए मिलाद उन नबी : इस्लामिक कैलेंडर के तीसरे महीने रबी-उल-अव्वल की 12वीं तारीख

नई दिल्ली : इस्लाम धर्म में दो ईदें ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा को सबसे अहम त्योहार माना जाता है, जो पूरे मुस्लिम समुदाय में बड़े धूमधाम से मनाई जाती हैं। लेकिन इनके अलावा मुसलमान एक और खास ईद भी मनाते हैं, जिसे ईद-ए मिलाद उन नबी कहा जाता है। इसे मौलिद या 12 वफात भी कहा जाता है। यह त्योहार इस्लामिक कैलेंडर के तीसरे महीने रबी-उल-अव्वल की 12वीं तारीख को मनाया जाता है, जो पैगंबर मोहम्मद साहब के जन्म दिवस के रूप में विख्यात है।

ईद-ए मिलाद उन नबी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत बड़ा है। इसे पैगंबर मोहम्मद साहब के जन्म और उनके जीवन की महान उपलब्धियों को याद करने के लिए मनाया जाता है। इस दिन मुसलमान उनके आदर्शों और शिक्षाओं को अपनाने का संकल्प लेते हैं और उनके जीवन की मिसाल से प्रेरणा लेते हैं। इस्लामी इतिहास में यह दिन प्रेम, एकता और आध्यात्मिक जागरूकता का प्रतीक माना जाता है, जो पूरे विश्व के मुसलमानों को एकजुट करता है।

ईद-ए मिलाद उन नबी 2025 कब है? : ईद-ए मिलाद उन नबी 2025 इस साल 5 सितंबर को मनाई जाएगी। यह दिन इस्लामिक कैलेंडर के 12 रबी-उल-अव्वल के साथ मेल खाता है। इस दिन को मुसलमान खुशी और श्रद्धा दोनों भावों के साथ मनाते हैं, क्योंकि इसी दिन पैगंबर मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था और उनकी पैगामदारी का आगाज भी इसी दिन माना जाता है। साथ ही, यह दिन उनकी मौत की भी याद दिलाता है, इसलिए इसे एक तरह से खुशी और दुख दोनों का त्योहार माना जाता है।

“मिलाद” शब्द का मतलब होता है ‘जन्म’। यह अरबी भाषा के शब्द ‘मौलिद’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है पैगंबर मुहम्मद साहब का जन्मदिन। फारसी भाषा में भी “मिलाद” का मतलब जन्म ही होता है। इसलिए ईद-ए मिलाद उन नबी का मतलब है पैगंबर के जन्मदिन का उत्सव, जिसे पूरे विश्व के मुसलमान बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं।

मुसलमान ईद-ए मिलाद उन नबी क्यों मनाते हैं? : 12 रबी-उल-अव्वल, जिसे 12 वफ़ात भी कहा जाता है, पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब के जन्मदिन और उनकी मौत दोनों की याद में मनाया जाता है। “वफ़ात” का मतलब होता है मृत्यु, इसलिए कुछ लोग इस दिन को पैगंबर साहब की मौत की याद में मनाते हैं, जबकि कई लोग इसे उनके जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं, जिसे ईद-ए मिलाद उन नबी कहा जाता है।

पैगंबर मुहम्मद साहब का जन्म और इंतकाल (मृत्यु) दोनों ही इसी तारीख को इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार आते हैं। मक्का में पैगंबर का जन्म हुआ था और मान्यताओं के अनुसार, उनकी मौत भी इसी दिन हुई थी। इसलिए इसे “बारह वफ़ात” कहा जाता है ‘बारह’ तारीख और ‘वफ़ात’ यानी इंतकाल। सुन्नी मुसलमान 12 रबी-उल-अव्वल को ईद-ए मिलाद उन नबी मनाते हैं, जबकि शिया मुसलमान इसे 17 रबी-उल-अव्वल को मनाते हैं।

मुसलमान 12 वफात कैसे मनाते हैं? : ईद-ए मिलाद उन नबी के दिन मुसलमान पैगंबर मुहम्मद साहब की शिक्षाओं और आदर्शों को याद करते हैं और उन पर चलने का संकल्प लेते हैं। इस दिन मस्जिदों में खास नमाज पढ़ी जाती है, कुरान की तिलावत की जाती है, और दुरूद शरीफ भेजा जाता है। कुछ लोग इस दिन को बड़े उत्साह से जश्न की तरह मनाते हैं, तो कुछ लोग शांति और इबादत में बिताते हैं।

इसके अलावा, इस दिन बड़े पैमाने पर जुलूस निकाले जाते हैं, जिसमें मुसलमान पैगंबर के जीवन और उनके संदेशों को याद करते हुए एकता और प्रेम का संदेश देते हैं। इस तरह, 12 वफात मुसलमानों के लिए एक खास दिन होता है जो उन्हें उनके धर्म और पैगंबर की शिक्षाओं के करीब लाता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए TheXpozNews उत्तरदायी नहीं है।

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